सरकार
की योजनाओं को दीमक की तरह उनके विभाग के अधिकांश कर्मचारी चाट रहे है। किसी भी
योजना को ले लिया जाए तो उसका क्रियान्वयन सही तरीके से हो तो कोई पात्र इधर-उधर न भटके लेकिन विभागों में
बिना नजराना चढ़ाए कोई काम नही होता है। एक चपरासी भी फाइल खोजने का सुविधा शुल्क
लेता है। सरकार की मंशा साफ
है कि पात्रों को योजना का लाभ मिले लेकिन सवाल यह है कि योजनाओं का क्रियान्वयन
कैसे हो। जिनके जिम्मे सारा कार्य ही चलता है उन अधिकांश कर्मचारियों को भेंट लेने
की लत लग गयी है और यह किसी ने नही कुछ लोगों ने लगायी है। अब लत लगी है तो
सुधरेगी कैसे। शायद हम यही कह सकते हैं कि यह लत नही सुधरने वाली है क्योंकि साहब
भी अच्छी तरह जानते है कि वर्कलोड अधिक है तो ऐसे काम कौन करेगा। साहब कर भी क्या
सकते है उन्हें मालूम है कि अधिकांश कर्मचारी तो भेट लेते ही है किसको -किसको निलम्बित करेंगे और ज्यादा को निलम्बित कर देंगे तो काम कौन
करेगा। मजबूरी है कि जांच बैठा देगे, डांट
डपट देंगे इससे ज्यादा क्या करेंगे। घूस लेने वाले कर्मचारी को दंडित करने का
कानून भी है लेकिन इस पचड़े में शरीफ क्यों पड़े। धीरे से कर्मचारी की जेब गर्म की
और हो गया तुरन्त काम। आखिर झंझट कौन पाले। सवाल यह है कि ऐसे में योजनाओं का लाभ
पात्रों को नही मिल पाता है और वह दर-दर भटकने को मजबूर हो जाते है। पात्रों का हक अपात्र ले लेते है।
यह क्रम नीचे से ऊपर तक बंधा है किसको-किसको कहां रोकेंगे। जरुरत है ईमानदार अधिकारी, कर्मचारी
की जो योजना का लाभ पात्रों तक पहुंचा सके लेकिन इन्हें ईमानदारी का पाठ कौन
पढ़ाये। घूस लेते रंगेहाथ तमाम कर्मचारी पकड़े जाते है लेकिन लगता है घूस लेने की
प्रथा ही चल पड़ी है। सरकार, जनता, अधिकारी
और कर्मचारी सभी मिलकर ही इस घूस लेनी की प्रथा पर पूर्ण विराम लगा सकते है और
योजना का लाभ पात्रों तक पहुंचा सकते है इसके लिए सभी को अपने दायित्वों का
निर्वहन करना चाहिए क्योंकि सरकार जानती है कि कर्मचारी के इतने बड़े तबके के खिलाफ
कार्रवाई करके भी काम बाधित रहेगा। http://shakti-anand.blogspot.in/
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