जन शिकायतों के निस्तारण के लिए शासन ने सख्त निर्देश दिया हैं वह यह हैं कि हर दशा में जन शिकायतों का निस्तारण किया जाय लेकिन इस निर्देश का पालन नहीं हो रहा हैं। सोनभद्र जिले में पीड़ित विभागों का चक्कर लगा लगा कर थक जा रहे हैं लेकिन उनकी समस्या का निस्तारण तो दूर उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं हैं। अधिकारियों के टेबुल पर शिकायतों का अम्बार लगा रहता हैं लेकिन वह अपने बचाव के लिए अपने मातहतों को शिकायतों के निस्तारण का निर्देश देकर अपना कोरम पूरा कर लेते हैं। उन्हें इससे कोई सारोकार नहीं हैं कि शिकायतों का निस्तारण हुआ कि नहीं।
मंगलवार, 16 जून 2015
रविवार, 7 जून 2015
नजराना चढ़ाओ काम कराओ!
सरकार
की योजनाओं को दीमक की तरह उनके विभाग के अधिकांश कर्मचारी चाट रहे है। किसी भी
योजना को ले लिया जाए तो उसका क्रियान्वयन सही तरीके से हो तो कोई पात्र इधर-उधर न भटके लेकिन विभागों में
बिना नजराना चढ़ाए कोई काम नही होता है। एक चपरासी भी फाइल खोजने का सुविधा शुल्क
लेता है। सरकार की मंशा साफ
है कि पात्रों को योजना का लाभ मिले लेकिन सवाल यह है कि योजनाओं का क्रियान्वयन
कैसे हो। जिनके जिम्मे सारा कार्य ही चलता है उन अधिकांश कर्मचारियों को भेंट लेने
की लत लग गयी है और यह किसी ने नही कुछ लोगों ने लगायी है। अब लत लगी है तो
सुधरेगी कैसे। शायद हम यही कह सकते हैं कि यह लत नही सुधरने वाली है क्योंकि साहब
भी अच्छी तरह जानते है कि वर्कलोड अधिक है तो ऐसे काम कौन करेगा। साहब कर भी क्या
सकते है उन्हें मालूम है कि अधिकांश कर्मचारी तो भेट लेते ही है किसको -किसको निलम्बित करेंगे और ज्यादा को निलम्बित कर देंगे तो काम कौन
करेगा। मजबूरी है कि जांच बैठा देगे, डांट
डपट देंगे इससे ज्यादा क्या करेंगे। घूस लेने वाले कर्मचारी को दंडित करने का
कानून भी है लेकिन इस पचड़े में शरीफ क्यों पड़े। धीरे से कर्मचारी की जेब गर्म की
और हो गया तुरन्त काम। आखिर झंझट कौन पाले। सवाल यह है कि ऐसे में योजनाओं का लाभ
पात्रों को नही मिल पाता है और वह दर-दर भटकने को मजबूर हो जाते है। पात्रों का हक अपात्र ले लेते है।
यह क्रम नीचे से ऊपर तक बंधा है किसको-किसको कहां रोकेंगे। जरुरत है ईमानदार अधिकारी, कर्मचारी
की जो योजना का लाभ पात्रों तक पहुंचा सके लेकिन इन्हें ईमानदारी का पाठ कौन
पढ़ाये। घूस लेते रंगेहाथ तमाम कर्मचारी पकड़े जाते है लेकिन लगता है घूस लेने की
प्रथा ही चल पड़ी है। सरकार, जनता, अधिकारी
और कर्मचारी सभी मिलकर ही इस घूस लेनी की प्रथा पर पूर्ण विराम लगा सकते है और
योजना का लाभ पात्रों तक पहुंचा सकते है इसके लिए सभी को अपने दायित्वों का
निर्वहन करना चाहिए क्योंकि सरकार जानती है कि कर्मचारी के इतने बड़े तबके के खिलाफ
कार्रवाई करके भी काम बाधित रहेगा। http://shakti-anand.blogspot.in/
हकीकत से दूर हैं सरकारी आंकड़े!
सोनभद्र में जनहित में चलायी जा रही तमाम योजनाओं का लाभ जनता तक नहीं पहुंच रहा है। आला अफसर इन योजनाओं को इस तरह क्रियान्वयित करते है जिससे जनता को योजना का लाभ मिले या न मिले। लेकिन उनकी जेबें गर्म हो जाय। मजेदार बात यह हैं कि इन योजनाओं को सरकारी आंकड़ों में दुरुस्त दिखाया जाता है। योजनाओं का लाभ जरुरत मंदों तक कितना पहुंच रहा है यह किसी से छिपा नहीं है। रोजाना पात्र व्यक्ति विभाग का चक्कर लगा कर चले जाते हैं उनकी कहीं सुनवायी नहीं होती है। साहब से मिलने की बात ही दूर है कर्मचारी है उन्हें डांट कर भगा देते है। ऐसे में वह कहां जाय उन्हें समझ में नहीं आता है। वहीं साहब कागजों में योजनाओं का क्रियान्वयन बेहत्तर दिखाते हैं और आंकड़ों में भी कही कमी नहीं रखते है। सरकारी कागजो में सब कुछ दुरुस्त रहता है लेकिन जमीनी हकीकत तलाशी जाय तो बहुत गड़बड़झाला दिखायी देगा। ऐसे में सरकार को ही इस तरफ कोई ठोस कदम उठाना होगा।
शनिवार, 6 जून 2015
आज हथियारों से नहीं बल्कि विचारों की लड़ाई
आज हथियारों से नहीं बल्कि विचारों की लड़ाई का युग है और मैं वैचारिक स्तर के इस युद्ध में हारने की आदत नहीं रखना चाहता .........!!
सुना है मैगी मे थोडा रासायन बढ गया, इसलिए उस पर बैन लगेगा....
सुना है मैगी मे थोडा रासायन बढ गया, इसलिए उस पर बैन लगेगा....
@ Shakti Anand Kanaujiya
तम्बाकू, सिगरेट और शराब मे सरकार को, उम्र बढाने के कौन से विटामिन, प्रोटीन दिखे जिनके लाईसेन्स वो रोज जारी कर रही है...??
@ Shakti Anand Kanaujiya
तम्बाकू, सिगरेट और शराब मे सरकार को, उम्र बढाने के कौन से विटामिन, प्रोटीन दिखे जिनके लाईसेन्स वो रोज जारी कर रही है...??
शुक्रवार, 29 मई 2015
विचार - 29 मई, 2015
अजीब सी कशमकश है जिंदगी में,
जितना दौडता हु,
मंजिल और दूर चली जाती है,
शायद.....................................
संघर्ष जिंदगी के साथ ही ख़त्म होता है
देर से ही सही पर आ गया स्वदेशी पेमेंट गेटवे
देर से ही सही पर आ गया स्वदेशी पेमेंट गेटवे
वीसा और मास्टर कार्ड की तरह काम करने वाला रुपे कार्ड पहला देसी कार्ड है. इस व्यवस्था की शुरुआत के साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जिनके पास खुद का पेमेंट गेटवे है. क्या इसको वह बुलंदी मिल पायेगी जो वीसा और मास्टर कार्ड को प्राप्त है. स्वदेशी पेमेंट गेटवे होने से रुपये की लागत इंटरनेशनल कार्ड की तुलना में काफी कम है. इस कार्ड से होने वाले लेन-देन पर बैंकों को इंटरनेशनल कार्ड के मुकाबले 40 फीसदी कम अदायगी करनी होती है. और उपभोक्ता को भी कम शुल्क देना पड़ेगा.
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