खबर है कि रेलगाड़ी से आते प्रवासी मजदूरों से किराया वसूला गया। करीब डेढ़ महीने की जटिल वेदनाओं को सहने के बाद उन भूखे-प्यासे, दर-दर की ठोकर खाए मजदूरों की दशा बिल्कुल खराब हो चुकी होगी। जो थोड़े बहुत पैसे उनकी जेबों में रहे होंगे, वे भी इस बंदी में खत्म हो गए होंगे। मगर उनसे टिकट का किराया तो वसूला ही गया, पानी और भोजन का रुपया भी अलग से लिया गया। जब पूरे देश में जगह-जगह खाने के पैकेट विभिन्न सामाजिक लोगों या संगठनों द्वारा बांटे जा सकते हैं, तो क्या सरकार रेलगाड़ी में बैठे मजदूरों को खाना-पानी नहीं दे सकती थी? जिन मजदूरों के कठिन परिश्रम से देश को मजबूती मिलती है, जब उनके साथ ऐसा होगा, तो किसानों, छात्रों जैसे निम्न आय वर्गों का क्या होगा? सरकार ने दूसरे देशों से अपने नागरिक बुलाए, तो शायद ही उनसे किराया लिया, तो फिर मजदूरों के साथ ऐसा क्रूर मजाक क्यों?
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