आज अमीर-गरीब, मजदूर-किसान, युवा-वृद्ध, सब कोरोना का दंश हर रोज झेल रहे हैं। इन्हें जीवन के लक्ष्य की नहीं, बस जीवन की छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने की चिंता इन दिनों लगी रहती है। मानो जीवन नीरस और उत्साहहीन हो गया है। मगर विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या लॉकडाउन का पालन करके और दैहिक दूरी बनाए रखकर ही इस महामारी को जीता जा सकता है? हमारी संस्कृति, जो युगों से ‘वसुधैव कुटुंबकम' का संदेश देती आ रही है, क्या इस महामारी के साथ उनका विलय हो जाएगा? हमारे त्योहार और उत्सव, जो जीवन में ऊर्जा का संचार करते हैं, उनके प्रति हमारा रवैया क्या इसी प्रकार उदासीन होता रहेगा? इन सभी सवालों के ऊपर विचार करने पर केवल एक समाधान नजर आता है कि हम सब एक-दूसरे का सहयोग करके सामाजिक सद्भाव और संवेदनाओं का आदर करते हुए जागरूक बनने के प्रयास करें, तभी इस महामारी को दूर भगाया जा सकता है।
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