प्रधानमंत्री मोदी की आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना के तहत विदेशी कंपनियों के निवेश को लेकर किया गया विश्लेषण सटीक है। निश्चित ही हमारे देश का आधारभूत ढांचा और अन्य परिस्थितियां अभी ऐसी नहीं हैं जो चीन से बाहर निकलने को आतुर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी ओर आकर्षति कर सकें। आजादी के बाद इस देश की नीति नियंत्रक राजनीति का उद्देश्य राष्ट्र-विकास की अपेक्षा स्व-विकास बन गया। जिसके फलस्वरूप राजनीति में भ्रष्टाचार और कदाचार को प्रश्रय मिलने लगा। ऐसे में राजनीति की चेरी बन चुकी देश की प्रशासनिक मशीनरी भी इससे अछूती नहीं रही। आज भले ही प्रधानमंत्री मोदी का सपना भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का है, लेकिन इस देश की राजनीति और लालफीताशाही में व्याप्त आधिकारिक भाव और तद्जन्य भ्रष्टाचार विकसित और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा बन रहे हैं। यद्यपि अब देश में विकास योजनाओं के क्रियान्यवयन को लेकर वैसी स्थिति नहीं रही जिसके संबंध में यह कहा जाता रहा है कि विकास के नाम पर केंद्र से निकलने वाला एक रुपया मूल लाभार्थी तक पहुंचते-पहुंचते 15 पैसे रह जाता है, शेष 85 पैसे ऊपर से नीचे तक की हिस्सेदारी की भेंट चढ़ जाता है। अब मोदी की डिजिटल इंडिया में केंद्रीय विकास योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थी को मिल रहा है। बावजूद इसके ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ की तर्ज पर भ्रष्टाचार के आदी लोग हर चौकसी का तोड़ निकाल ही लेते हैं। अब जहां तक विदेशी कंपनियों के निवेश का प्रश्न है तो वे भी पग-पग पर नियमों का हवाला देकर अवरोध पैदा करने वाली भारत की प्रशासनिक मशीनरी से सशंकित हैं। ऐसे में सरकारी काम-काज को निर्बाध रूप से संपादित करने के लिए डिजिटल इंडिया के न्यू कांसेप्ट को बढ़ावा देकर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की जरूरत है
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